वृन्दावन आनन्द घन, सब तें उत्तम आहि।
मोते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (99)
यह श्री वृन्दावन परमानन्दस्वरूप, सर्वोपरि और सर्वोत्कृष्ट है; और इधर मैं पतितों का सिरमौर—इसे कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?
मोते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (99)
यह श्री वृन्दावन परमानन्दस्वरूप, सर्वोपरि और सर्वोत्कृष्ट है; और इधर मैं पतितों का सिरमौर—इसे कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

