अस्तंगच्छत्सूर्या शुशुक्षणौ दिवसदु:ख होमोऽस्तु।
त्वत्पृष्ट प्रिय वार्ता कनिं मे ब्रह्म यज्ञोस्तु॥
- श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामीनीजी प्रार्थना (4)
हे श्री राधे,ऐसा मेरा सौभाग्य कब होगा कि मेरा दिन भर का दुःख अस्त होते हुए सूर्य के हवन कुंड अग्नि में भस्म हो जाये तथा आपको प्रिय लगने वाले प्रियतम की प्रेम वार्ता को आपको सुनाने से मेरा ब्रह्म यज्ञ पूर्ण हो जाए।
त्वत्पृष्ट प्रिय वार्ता कनिं मे ब्रह्म यज्ञोस्तु॥
- श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामीनीजी प्रार्थना (4)
हे श्री राधे,ऐसा मेरा सौभाग्य कब होगा कि मेरा दिन भर का दुःख अस्त होते हुए सूर्य के हवन कुंड अग्नि में भस्म हो जाये तथा आपको प्रिय लगने वाले प्रियतम की प्रेम वार्ता को आपको सुनाने से मेरा ब्रह्म यज्ञ पूर्ण हो जाए।

