पिय तोही नयनन ही में राख़ूँ । [1]
तेरी एक रोम की छबी पर जगत वार सब नाखूँ ।। [2]
भेटों सकल अंग साँवल कूँ अधर सुधारस चाखूँ । [3]
रसिक प्रीतम संगम की बातें काहूसों नहिं भाखूँ ।। [4]
- श्री हरिराय जी
हे, मेरे प्रियतम, मैं सदैव आपकी छवि को अपनी आँखों में बसा कर रखूँ। [1]
आपके एक रोम की छवि पर मैं समस्त जगत को न्योछावर कर दूँ। [2]
श्री हरिरायजी कहते हैं, "हे श्यामसुंदर, जब आप मिलोगे, तब मैं आपको आलिंगन करुँ तथा अधर सुधा रस पान कर, हे रसिक प्रीतम, आपसे मिलने की बात मैं किसी से भी नहीं कहूँ!" [3 & 4]
तेरी एक रोम की छबी पर जगत वार सब नाखूँ ।। [2]
भेटों सकल अंग साँवल कूँ अधर सुधारस चाखूँ । [3]
रसिक प्रीतम संगम की बातें काहूसों नहिं भाखूँ ।। [4]
- श्री हरिराय जी
हे, मेरे प्रियतम, मैं सदैव आपकी छवि को अपनी आँखों में बसा कर रखूँ। [1]
आपके एक रोम की छवि पर मैं समस्त जगत को न्योछावर कर दूँ। [2]
श्री हरिरायजी कहते हैं, "हे श्यामसुंदर, जब आप मिलोगे, तब मैं आपको आलिंगन करुँ तथा अधर सुधा रस पान कर, हे रसिक प्रीतम, आपसे मिलने की बात मैं किसी से भी नहीं कहूँ!" [3 & 4]

