मदन सुधा के रस भरे, फूलि रहे दिन रैंन।
चहुँदिसि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिनि के नैंन॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (31)
ये रूप और रंग के मूर्तिमान दो पुष्प (श्री श्यामा-श्याम) प्रेम-सुधा-रस से भरे दिन-रैन सदा प्रफुल्लित रहते हैं, और सखियों के नयन-रूपी भ्रमर इन पर निरंतर मंडराते हुए रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं।
चहुँदिसि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिनि के नैंन॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (31)
ये रूप और रंग के मूर्तिमान दो पुष्प (श्री श्यामा-श्याम) प्रेम-सुधा-रस से भरे दिन-रैन सदा प्रफुल्लित रहते हैं, और सखियों के नयन-रूपी भ्रमर इन पर निरंतर मंडराते हुए रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं।

