प्रेम के खिलौना दोउ खेलत है प्रेम-खेल - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (40)

प्रेम के खिलौना दोउ खेलत है प्रेम-खेल - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (40)

प्रेम के खिलौना दोउ खेलत है प्रेम-खेल,
प्रेम-फूल फूलनि सौं प्रेम-सेज रची है। [1]
प्रेम ही की चितवनि मुसिकनि प्रेम ही की,
प्रेम रँगी बात करैं प्रेम-केलि मची है॥ [2]
प्रेम के तरंगनि में प्रीतम परे हैं दोऊ,
प्रेम प्यार-भार प्यारी पिय-हिय लची है। [3]
'हित ध्रुव' प्रेम भरी प्यारी सखी देखैं खरी,
हित-चितवनि छवि आनि उर सची है॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (40)

ये श्यामा-श्याम प्रेम के खिलौने हैं, जो निरंतर प्रेम-क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। सखियों ने इनकी प्रेम-क्रीड़ा के लिए उत्साहपूर्वक शय्या की रचना की है। [1]

इनकी परस्पर की चितवन, उनहार और मुस्कान सभी प्रेम में रंगी हुई हैं। इनकी सहज वार्ता भी प्रेममयी है और इनकी समस्त केलि प्रेम राग रंजित है। [2]

युगल किशोर प्रेम-सिन्धु की प्रेमोच्छलित तरंगों में नित्य तरंगायित रहते हैं। आज प्रियतम के अतिशय लाड़ को प्राप्त कर, सुहाग-भरी लाड़िली प्रेम-भार से भारान्वित होकर प्रियतम के हृदय पर झुकी हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया की लाड़-भाजन प्रेम-भरी सखियाँ, जिनके हृदय में युगल की हितमयी चितवन चुभी हुई है, आज युगल की प्रेम-केलि का दर्शन करके अघाती नहीं हैं। [4]