कहा है परायो सब दीसत सो राधे ही को,
बिन ही विचारैं झूठे बचन उचारे जू। [1]
राधे ही की भूमि यह राधे ही के खग मृग,
राधे ही को नाम रटैं साँझ ओ सँवारे जु॥ [2]
राधे ही के सरवर ये तरवर हैं राधे जू के,
राधे ही के फूल फल नागर निहारे जू। [3]
राधे की दुहाई फिरैं राधे ही को वृन्दावन,
तुम कौन लला बीच हटकनि हारे जू॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, सांझी फूल बीनन में संवाद (4)
सखी श्याम सुंदर से कहती है, यहाँ श्री ब्रज धाम में कुछ पराया कहाँ है? सब कुछ जो दिख रहा है, वह तो हमारी स्वामिनी श्री राधा जी का ही है। आपने बिना विचार किए ही झूठे वचन बोले कि इस वन के रखवार तुम हो। [1]
बिन ही विचारैं झूठे बचन उचारे जू। [1]
राधे ही की भूमि यह राधे ही के खग मृग,
राधे ही को नाम रटैं साँझ ओ सँवारे जु॥ [2]
राधे ही के सरवर ये तरवर हैं राधे जू के,
राधे ही के फूल फल नागर निहारे जू। [3]
राधे की दुहाई फिरैं राधे ही को वृन्दावन,
तुम कौन लला बीच हटकनि हारे जू॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, सांझी फूल बीनन में संवाद (4)
सखी श्याम सुंदर से कहती है, यहाँ श्री ब्रज धाम में कुछ पराया कहाँ है? सब कुछ जो दिख रहा है, वह तो हमारी स्वामिनी श्री राधा जी का ही है। आपने बिना विचार किए ही झूठे वचन बोले कि इस वन के रखवार तुम हो। [1]
यह भूमि भी श्री राधा की है, और यहाँ के पशु-पक्षी भी श्री राधा के हैं, जो सुबह-शाम केवल श्री राधा नाम ही रटते हैं। [2]
यहाँ के सरोवर श्री राधा के हैं, और यहाँ के वृक्ष भी श्री राधा जी के ही हैं, एवं मुझे जो यहाँ फल-फूल दिखाई पड़ रहे हैं, ये भी श्री राधा के ही हैं। [3]
श्री नागरीदास कहते हैं, "सखी कहती है कि - यह वृन्दावन भी श्री राधा रानी का ही है, और यहाँ का कण-कण श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक विनय करता है। अरे, जब सब कुछ श्री राधा रानी का ही है, तो लाल, तू क्यों गाय को हांकने की हटकनी लिए, हारे हुए की भाँति यहाँ आया है? अर्थात् तुम्हारा क्या प्रयोजन है हमसे ऐसे बात करने का?" [4]

