(राग विभास)
प्रात समै दोऊ रस लंपट,
सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल। [1]
श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर
भूषन अंगहिं अंग विकूल॥ [2]
कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि,
वदन कमल मानौं अलि भूल। [3]
(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे,
नैंन बैंन कटि सिथिल दुकूल॥[4]
- श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (3)
भावार्थ - प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता पूर्वक संलग्न हैं। [1]
मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक जैसी शोभित हैं एवं समस्त अङ्ग प्रत्यङ्गों के आभरण अस्त व्यस्त हैं। [2]
(ललाट पटल का) तिलक कुछ कुछ शेष रह गया है। अलकावलि शिथिल (ढीली) हो चुकी है (और बिखर रही है, जिससे ऐसा) विदित होता है कि वदन कमल पर प्रमत्त भ्रमर मँडरा रहे हैं। [3]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि (युगल किशोर) प्रेम (मदन) के (आनन्द) रङ्ग में रञ्जित हो रहे हैं, उनके नयन वचन, कटि एवं कटि के वस्त्र (सारी आदि) सभी तो शिथिल हैं। [4]
प्रात समै दोऊ रस लंपट,
सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल। [1]
श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर
भूषन अंगहिं अंग विकूल॥ [2]
कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि,
वदन कमल मानौं अलि भूल। [3]
(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे,
नैंन बैंन कटि सिथिल दुकूल॥[4]
- श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (3)
भावार्थ - प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता पूर्वक संलग्न हैं। [1]
मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक जैसी शोभित हैं एवं समस्त अङ्ग प्रत्यङ्गों के आभरण अस्त व्यस्त हैं। [2]
(ललाट पटल का) तिलक कुछ कुछ शेष रह गया है। अलकावलि शिथिल (ढीली) हो चुकी है (और बिखर रही है, जिससे ऐसा) विदित होता है कि वदन कमल पर प्रमत्त भ्रमर मँडरा रहे हैं। [3]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि (युगल किशोर) प्रेम (मदन) के (आनन्द) रङ्ग में रञ्जित हो रहे हैं, उनके नयन वचन, कटि एवं कटि के वस्त्र (सारी आदि) सभी तो शिथिल हैं। [4]

