॥दोहा॥
अङ्ग अङ्ग नागर नवल, पहरि कमल की माल।
मेरे हिय में सुख-सनें, बिलसौ दोऊ लाल॥
॥पद॥
बिलसौ दोउ लाल मेरे हिय-सदन सुख-सने। [1]
सुरत-रस-लीग अङ्ग अङ्ग नागर नवल,
कमल की माल लहलही डहडह तने॥ [2]
मुकुट की लटक अरविन्द-पद परसिनी,
सरसिनी समर अद्भुत सु आनन्दघने। [3]
श्रीहरिप्रिया ललित उरसौं मिली झिलिमिलि,
दिलिमिली दिपति दुति जोर जोबनजने॥ [4]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (19)
॥दोहा॥
श्रीस्वामिनी जी का दिव्य मंगल विग्रह एक प्रकार की स्वर्ण कमलों की माला होकर श्रीलालजू के अंग-अंग में सुशोभित है। श्रीहरिप्रियाजू प्रार्थना करती हैं कि इस सुख में मग्न और प्रेम-क्रीड़ा में विलास करते हुए उन दोनों की रूप-माधुरी मेरे हृदय में सदा विराजमान रहे।
॥पद॥
यह रसिक दम्पति जो सुख में सने हुये और जिनके अंग अंग सुरति क्रीड़ा में लीन हो रहे हैं, सदा ह्रदय में रहें। [1]
इस समय डहडतें लहलह कमलों की माला स्वरूपा श्रीलड़ैंतीजू के दोनों चरण लालजू के अंसों पर झूल रही है । [2]
श्रीलाल जू का मुकट श्रीप्रिया जू के चरणार बिन्दु से स्पर्श हो रहा है। उपरोक्त समर युद्ध ने दोनों के हृदय को सरस बना दिया और अद्भुत प्रगाढ़ आनन्द प्रदान किया। [3]
इस समय इन दोनों के ह्रदय से हृदय, दिल से दिल मिले हुए झिलमिल झिलमिल कर रहे हैं। और इन दोनों के प्रगाढ़ यौवन की द्युति देदिप्यमान हो रही है। [4]
अङ्ग अङ्ग नागर नवल, पहरि कमल की माल।
मेरे हिय में सुख-सनें, बिलसौ दोऊ लाल॥
॥पद॥
बिलसौ दोउ लाल मेरे हिय-सदन सुख-सने। [1]
सुरत-रस-लीग अङ्ग अङ्ग नागर नवल,
कमल की माल लहलही डहडह तने॥ [2]
मुकुट की लटक अरविन्द-पद परसिनी,
सरसिनी समर अद्भुत सु आनन्दघने। [3]
श्रीहरिप्रिया ललित उरसौं मिली झिलिमिलि,
दिलिमिली दिपति दुति जोर जोबनजने॥ [4]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (19)
॥दोहा॥
श्रीस्वामिनी जी का दिव्य मंगल विग्रह एक प्रकार की स्वर्ण कमलों की माला होकर श्रीलालजू के अंग-अंग में सुशोभित है। श्रीहरिप्रियाजू प्रार्थना करती हैं कि इस सुख में मग्न और प्रेम-क्रीड़ा में विलास करते हुए उन दोनों की रूप-माधुरी मेरे हृदय में सदा विराजमान रहे।
॥पद॥
यह रसिक दम्पति जो सुख में सने हुये और जिनके अंग अंग सुरति क्रीड़ा में लीन हो रहे हैं, सदा ह्रदय में रहें। [1]
इस समय डहडतें लहलह कमलों की माला स्वरूपा श्रीलड़ैंतीजू के दोनों चरण लालजू के अंसों पर झूल रही है । [2]
श्रीलाल जू का मुकट श्रीप्रिया जू के चरणार बिन्दु से स्पर्श हो रहा है। उपरोक्त समर युद्ध ने दोनों के हृदय को सरस बना दिया और अद्भुत प्रगाढ़ आनन्द प्रदान किया। [3]
इस समय इन दोनों के ह्रदय से हृदय, दिल से दिल मिले हुए झिलमिल झिलमिल कर रहे हैं। और इन दोनों के प्रगाढ़ यौवन की द्युति देदिप्यमान हो रही है। [4]

