स्पर्शयदाननलोचन हृदये जिघ्रन्मुहुर्मुहुः किमपि।
राधा-सुरभि-सुशीतल-पदकमलं धाम शोभते श्यामम्॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.31)
श्रीराधा जी के सुगन्धित सुशीतल चरण-कमलों का अपने वदन, लोचन तथा हृदय को स्पर्श कराके बार-बार घ्राण करते हुए कोई अनिर्वचनीय श्याम-विग्रह विराजमान है।
राधा-सुरभि-सुशीतल-पदकमलं धाम शोभते श्यामम्॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.31)
श्रीराधा जी के सुगन्धित सुशीतल चरण-कमलों का अपने वदन, लोचन तथा हृदय को स्पर्श कराके बार-बार घ्राण करते हुए कोई अनिर्वचनीय श्याम-विग्रह विराजमान है।

