केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.3)

केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.3)

(सुरत केलि)
केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई। [1]
लालची लाल रँगे रस-बाल, बिलोकि रहे 'ध्रुव' सुंदरताई॥ [2]
पीवत नैंन कटाक्षनि माधुरी , कौतुक एक न कैंहूँ अघाई। [3]
सो हित हेरि लुभाइ रह्यौ, रुचि कौं रुचि देखिकै आप लजाई॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.3)

आज सुकुमारी गौरांगी प्रिया एवं रसिक शेखर श्री बिहारी सरस विहार परायण हैं। उनकी वर्तमान् छबि वाणी - अगोचर है। [1]
श्री धुवदास जी कहते हैं कि रस - लम्पट प्रियतम रस स्वरूपा नव बाला के रूप - रसासव - दर्शन में छके उनकी रूपसुधा का निरन्तर पान करते ही रहते हैं । [2]
प्रियतम सहज सुन्दरी नव सुकुमारी की नव-नव छवि की अनेक भंगिमाओं का सतत दर्शन करते हुए भी कभी परितृप्त नहीं होते हैं । [3]
युगल के इस विलक्षण हित का अवलोकन कर मूर्तिमान् हित भी प्रलोभित हो जाता है एवं युगल की नित्य वर्द्धित सरस रुचि को देखकर स्वयं रुचि भी लज्जित हो उठती है। [4]