(राग कान्हरौ)
इत उत कौं कौं सिधारति (मेरी) आँखिन आगेंही तू आव। [1]
प्रीति कौ हित हौं तौ तेरौ जानौं ऐसौई राखि सुभाव॥ [2]
अमृत से बचन जिय की प्रकृति सौं मिलै ऐसौई दै दाव॥ [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
प्रीति कौ मंगल गाव॥ [4]
-ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (05)
पिय प्यारी जी से मधुर वचन बोले - हे प्यारी जी । आप के रसीले नयन क्यों इधर उधर गमन करते हैं। [1]
हे लाड़िली जी ! मेरी आँखें चाहती हैं कि आपके रसभरे कमल नयन मेरी आँखों के आगे आयें, नयन से नयन मिलें तब जाकर मेरी सुख प्राप्त करने की प्रतीक्षा समाप्त होगी, मैं आपका नित्य ही हित चाहता हूँ, आप ऐसा ही स्वभाव मेरे प्रति रखें। [2]
अपने अमृत से वचन अपने हृदय के सरल स्वभाव से मिलाओ, और मुझे यह अवसर प्रदान करो । [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्याम कहते हैं कि हे प्यारी, अब तो प्रीति का मंगल गाओ । [4]
इत उत कौं कौं सिधारति (मेरी) आँखिन आगेंही तू आव। [1]
प्रीति कौ हित हौं तौ तेरौ जानौं ऐसौई राखि सुभाव॥ [2]
अमृत से बचन जिय की प्रकृति सौं मिलै ऐसौई दै दाव॥ [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
प्रीति कौ मंगल गाव॥ [4]
-ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (05)
पिय प्यारी जी से मधुर वचन बोले - हे प्यारी जी । आप के रसीले नयन क्यों इधर उधर गमन करते हैं। [1]
हे लाड़िली जी ! मेरी आँखें चाहती हैं कि आपके रसभरे कमल नयन मेरी आँखों के आगे आयें, नयन से नयन मिलें तब जाकर मेरी सुख प्राप्त करने की प्रतीक्षा समाप्त होगी, मैं आपका नित्य ही हित चाहता हूँ, आप ऐसा ही स्वभाव मेरे प्रति रखें। [2]
अपने अमृत से वचन अपने हृदय के सरल स्वभाव से मिलाओ, और मुझे यह अवसर प्रदान करो । [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्याम कहते हैं कि हे प्यारी, अब तो प्रीति का मंगल गाओ । [4]

