कानन में रहे झलकि कैं, आनन विवि विधु काँति।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (32)
श्री वृन्दावन में हित-युगल के मुख-चन्द्र की कांति निरंतर झिलमिलाती रहती है, जिसे सहज स्नेहमूर्ति सखियाँ चकोर की भाँति निरखकर अपने मन और प्राणों को शीतल करती हैं।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (32)
श्री वृन्दावन में हित-युगल के मुख-चन्द्र की कांति निरंतर झिलमिलाती रहती है, जिसे सहज स्नेहमूर्ति सखियाँ चकोर की भाँति निरखकर अपने मन और प्राणों को शीतल करती हैं।

