मोहन कृपा कटाक्ष निहारैंगे। [1]
मेरे औगुन सबै बिसरि कैं अपने विरद विचारैंगे॥ [2]
वृन्दाविपुन बास दृढ़ दैकैं अब दुख दूर निवारैंगे। [3]
नागरिदास नांव कैं नातैं बिगरी बात सुधारैंगे॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (140)
श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। [1]
मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंगे। [2]
मुझे श्री वृन्दावन धाम का नित्य वास देकर मेरे समस्त दुखों का निवारण करेंगे। [3]
श्री नागरीदास कहते हैं "रसिकों ने उनका नाम पतित पावन बताया है, मैं पतित हूँ यह मानता हूँ, और यह भी मानता हूँ कि वह पतित पावन हैं, अत: अपने नाम को सत्य करने के लिए, वह अवश्य ही मेरी बिगड़ी बात सुधार ही देंगे”। [4]
मेरे औगुन सबै बिसरि कैं अपने विरद विचारैंगे॥ [2]
वृन्दाविपुन बास दृढ़ दैकैं अब दुख दूर निवारैंगे। [3]
नागरिदास नांव कैं नातैं बिगरी बात सुधारैंगे॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (140)
श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। [1]
मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंगे। [2]
मुझे श्री वृन्दावन धाम का नित्य वास देकर मेरे समस्त दुखों का निवारण करेंगे। [3]
श्री नागरीदास कहते हैं "रसिकों ने उनका नाम पतित पावन बताया है, मैं पतित हूँ यह मानता हूँ, और यह भी मानता हूँ कि वह पतित पावन हैं, अत: अपने नाम को सत्य करने के लिए, वह अवश्य ही मेरी बिगड़ी बात सुधार ही देंगे”। [4]

