ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित - श्री हित स्फुट वाणी (3)

ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित - श्री हित स्फुट वाणी (3)

ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित। [1]
छुटि चेतन जु अचेत तेऊ मुनि भये विष वासित॥ [2]
पाराशर सुर-इन्द्र कल्प, कामिनी मन फंद्या।[3]
परि व देह दुख-द्वन्द्व कौन क्रम-काल निकंद्या॥[4]
इहि डरहि डरपि हरिवंश हित जिनहि भ्रमहि गुण-सलिल पर। [5]
जिहि नामनि मंगल लोक तिहु सु हरि-पद भज न विलंब कर॥ [6]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (3)

व्याख्या:- यह नहीं जाना जा सकता कि किस क्षण के समाप्त होते होते कौन सी बुद्धि मन में प्रकाशित हो जायेगी। [1]
क्योंकि जो मुनिगण साधन करते-करते अचेतन जैसे बन गये वे भी अवसर आने पर विष व्याप्त हो गये (मोह ग्रसित हो गये)। [2]
पाराशर एवं इंद्रदेव के समान व्यक्तियों के मन को कामिनियों ने अपने फंदे में फँसा लिया। [3]
शरीर के पीछे दुख-द्वन्द्व लगे हुये हैं और काल के क्रम का छेदन कौन कर सका है ? [4]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि इस भय से डरकर तू त्रिगुण रूपी जल पर भ्रमण करना छोड़ दे और जिनके नाम में तीनों लोकों का मंगल करने की सामर्थ्य है उन श्रीहरि के चरणों का अविलम्ब भजन कर। [5 & 6]