जो कछु है सो राधिका, मो कछु और न चाह।
राधा-पद-पन-पैज को, राधा-हाथ निबाह॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (82)
मुझे जो भी चाह है, वह केवल श्री राधिका जी ही हैं—और कुछ नहीं। श्री राधा-चरण-रति ही मेरा प्रण और प्रतिज्ञा है, उसे निभाने का उत्तरदायित्व भी स्वयं श्री राधा के ही हाथों में है। वे ही अपनी कृपा से इस शरणागति को पूर्ण करेंगी।
राधा-पद-पन-पैज को, राधा-हाथ निबाह॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (82)
मुझे जो भी चाह है, वह केवल श्री राधिका जी ही हैं—और कुछ नहीं। श्री राधा-चरण-रति ही मेरा प्रण और प्रतिज्ञा है, उसे निभाने का उत्तरदायित्व भी स्वयं श्री राधा के ही हाथों में है। वे ही अपनी कृपा से इस शरणागति को पूर्ण करेंगी।

