(राग सारंग)
जाकी मनमोहन दृष्टि परे।
सो तो भयो साँवन को अंधो सूझत रंग हरे॥ [1]
जड़ चैतन्य कछु नहीं सूझै जित देखै तित स्याम खरे ।
विहवल विकल संभार न तन की घूमत नैना रूप भरे ॥ [2]
करनी अकरनी दोउ सुधि भूलि विधि निषेध सब रहे धरे ।
श्री नरहरिदास ते भए बावरे जे प्रेम प्रवाह परे ॥ [3]
- श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (1)
श्री नरहरि देव जी कहते है, जो कृपापात्र जीव श्री बिहारी जी को आँख भर [भावपूर्ण] निहार लेता है, वो एक प्रकार का बावरा (पागल) हो जाता है, जैसे सावन ऋतु को देखकर कोई अँधा हो जाए तो उसे जीवन भर हरियाली ही हरियाली प्रतीत होती है। [1]
वह प्रेमी, जड़ चेतन सभी में श्री बिहारी जी ही दर्शन करता है। प्रेम में विह्रल-विकल होने के कारण उसे अपने शरीर की भी सुधि नहीं रहती। उसके नेत्रों में सतत श्री बिहारी जी की रूपमाधुरी भरी रहती है। [2]
श्री नरहरि देव जी कहते है, ऐसे प्रेमी जन को विधि-निषेध, कर्ता-अकर्ता किसी भी प्रकार की सुधि नहीं होती है। जो भी इस प्रेम के प्रवाह में अथवा मार्ग मे पड़ जाता है वह बावरा (पागल) हो जाता है। [3]
जाकी मनमोहन दृष्टि परे।
सो तो भयो साँवन को अंधो सूझत रंग हरे॥ [1]
जड़ चैतन्य कछु नहीं सूझै जित देखै तित स्याम खरे ।
विहवल विकल संभार न तन की घूमत नैना रूप भरे ॥ [2]
करनी अकरनी दोउ सुधि भूलि विधि निषेध सब रहे धरे ।
श्री नरहरिदास ते भए बावरे जे प्रेम प्रवाह परे ॥ [3]
- श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (1)
श्री नरहरि देव जी कहते है, जो कृपापात्र जीव श्री बिहारी जी को आँख भर [भावपूर्ण] निहार लेता है, वो एक प्रकार का बावरा (पागल) हो जाता है, जैसे सावन ऋतु को देखकर कोई अँधा हो जाए तो उसे जीवन भर हरियाली ही हरियाली प्रतीत होती है। [1]
वह प्रेमी, जड़ चेतन सभी में श्री बिहारी जी ही दर्शन करता है। प्रेम में विह्रल-विकल होने के कारण उसे अपने शरीर की भी सुधि नहीं रहती। उसके नेत्रों में सतत श्री बिहारी जी की रूपमाधुरी भरी रहती है। [2]
श्री नरहरि देव जी कहते है, ऐसे प्रेमी जन को विधि-निषेध, कर्ता-अकर्ता किसी भी प्रकार की सुधि नहीं होती है। जो भी इस प्रेम के प्रवाह में अथवा मार्ग मे पड़ जाता है वह बावरा (पागल) हो जाता है। [3]

