धनि यह वृन्दावन की रेनु - श्री सूरदास जी, सूरसागर, वृन्दावन लीला (14)

धनि यह वृन्दावन की रेनु - श्री सूरदास जी, सूरसागर, वृन्दावन लीला (14)

(राग सारंग)
धनि यह वृन्दावन की रेनु। [1]
नंद-किसोर चरावत गैयाँ, मुखहिं बजावत बेनु॥ [2]
मन-मोहन को ध्यान धरै जिय, अति सुख पावत चैनु। [3]
चलत कहाँ मन और पुरी तन, जहँ कछु लैन न दैनु॥ [4]
इहाँ रहहु जहँ जूठनि पावहु, बृजवासिनि कै ऐनु। [5]
सूरदास ह्याँ की सरवरि नहि, कल्पवृच्छ सुर-धैनु॥ [6]

- श्री सूरदास जी, सूरसागर (1109)

वृन्दावन की रज धन्य है। [1]
जहाँ श्री कृष्ण गऊ चराते हैं और वंशी बजाते हैं। [2]
जो व्यक्ति मन को मोहित करने वाले कृष्ण का ध्यान धरता है वह अत्यन्त सुख तथा चैन प्राप्त करता है। [3]
यह मन अन्य पुरी की ओर कहाँ जा सकता है जहाँ न कुछ लेना है न देना। [4]
यहीं रहो, जहाँ कृष्ण की जूठन (प्रसाद) प्राप्त होगी, क्योंकि यहीं व्रजवासियों का घर है। [5]
सूरदास कहते हैं कि इस रज की समता कल्पवृक्ष तथा कामधेनु भी नही प्राप्त कर सकते। [6]