रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया - श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रन्थ 6 (3)

रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया - श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रन्थ 6 (3)

(राग पूर्वी)
रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया। [1]
अंजन दै, मन रंजन कीनौं, खंजन दृग फसिया॥ [2]
करि मनुहारि भुजन भरि भेंटी, बदन चूमि हसिया। [3]
सुनि भगवत फिरी लेत बलइया, करत मदन बसिया॥ [4]

- श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रन्थ 6 (3)

रसिक वर प्रियतम बड़े ही रसीले रसिया हैं। [1]
इन्होंने प्रियतमा के नेत्रों में अंजन पूर कर उनके मन को अनुराग से ऐसा रँगा कि उनके खंजन-जैसे (विशाल और चंचल) नयनों के सौन्दर्य में स्वयं ही फँस गये। [2]
फिर वह श्री प्रियाजी की मनुहार करने लगे, उन्होंने इनको भुजाओं में भर कर हृदय से लगा लिया, तो ये उनके मुखारविन्द का चुम्बन करके खिल-खिला कर हँस पड़े। [3]
मदन को भी वश में करने वाले मोहन की इस मन-मोहिनी हँसी (की खिलखिलाहट) को सुनकर नित्य सखी भगवत अली उनकी बार-बार बलैया लेने लगी हैं। [4]