श्री राधेरानी प्रेम तत्व की सार ।
निगमागम ते अगम सुगम अति, दीनन हित सुकुमार ।। [1]
विधि हरि हर की कौन बात जब, ब्रह्म न पायो पार ।
क्रंदन करुण सुनावत धावति, निज सुधि – देह बिसार ।। [2]
‘राधे’ नाम पुकारत राधे, बरसावति जलधार ।
मोहिं ‘कृपालु’ अब भय काको जब, श्री राधे रखवार ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त - माधुरी (102)
श्री वृषभानुनन्दिनी प्रेम तत्व की सार हैं। किशोरी जी वेदों और शास्त्रों से भी सर्वथा अगम्य होते हुए भी दीनजनों के लिए अत्यन्त सुगम हैं। [1]
ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि की तो राधा तत्व पाने की शक्ति ही कहाँ है, जब साक्षात्त् परात्पर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म भी जिसका पार नहीं पा सके । जब जीव करूण क्रंदन कर श्री राधा को पुकारता है तो अपनी सुधि भूलकर श्रीजी उस जीव की ओर भागती हैं। [2]
किशोरी जी दीनों के लिए इतनी सरल हैं कि जब भी दीन, आर्त भाव से ‘राधे’ कहकर उन्हें पुकारता है तब किशोरी जी भी अधीर होकर अपनी आँखों से आँसू बहाने लगती हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जब ऐसी ही सरल, सुकुमार, अलबेली सरकार वृषभानुदुलार हमारी रखवार हैं तब मुझे डर ही किसका है। [3]
निगमागम ते अगम सुगम अति, दीनन हित सुकुमार ।। [1]
विधि हरि हर की कौन बात जब, ब्रह्म न पायो पार ।
क्रंदन करुण सुनावत धावति, निज सुधि – देह बिसार ।। [2]
‘राधे’ नाम पुकारत राधे, बरसावति जलधार ।
मोहिं ‘कृपालु’ अब भय काको जब, श्री राधे रखवार ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त - माधुरी (102)
श्री वृषभानुनन्दिनी प्रेम तत्व की सार हैं। किशोरी जी वेदों और शास्त्रों से भी सर्वथा अगम्य होते हुए भी दीनजनों के लिए अत्यन्त सुगम हैं। [1]
ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि की तो राधा तत्व पाने की शक्ति ही कहाँ है, जब साक्षात्त् परात्पर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म भी जिसका पार नहीं पा सके । जब जीव करूण क्रंदन कर श्री राधा को पुकारता है तो अपनी सुधि भूलकर श्रीजी उस जीव की ओर भागती हैं। [2]
किशोरी जी दीनों के लिए इतनी सरल हैं कि जब भी दीन, आर्त भाव से ‘राधे’ कहकर उन्हें पुकारता है तब किशोरी जी भी अधीर होकर अपनी आँखों से आँसू बहाने लगती हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जब ऐसी ही सरल, सुकुमार, अलबेली सरकार वृषभानुदुलार हमारी रखवार हैं तब मुझे डर ही किसका है। [3]

