कुंज ते निकसि दोऊ ठाढ़े जमुना के तीर ,
आजु सखी औरै भाँति प्रिया रंग भरी हैं। [1]
निसि के चिन्हनि चितै मुसकात रस - निधि,
वहु विधि सुख - केलि रंग - रस ढरी हैं॥ [2]
देखैं 'ध्रुव' छबि सींवा मृदु भुज मेलैं ग्रीवा,
हंसी, भौंरी, मोरी, मृगी ठौर ते न टरी हैं। [3]
हरी - हरी लाल - लाल पीत - सेत सारी तन ,
पहिरैं सहेली सबै चित्र की सी खरी हैं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (49)
हे सखि! श्री लाड़ली-लाल दोनों ही अपने कुञ्ज से निकलकर यमुना के तट पर खड़े हुए हैं, और लाड़ली प्रिया आज कुछ विलक्षण छबि-छटा से युक्त हैं। [1]
आजु सखी औरै भाँति प्रिया रंग भरी हैं। [1]
निसि के चिन्हनि चितै मुसकात रस - निधि,
वहु विधि सुख - केलि रंग - रस ढरी हैं॥ [2]
देखैं 'ध्रुव' छबि सींवा मृदु भुज मेलैं ग्रीवा,
हंसी, भौंरी, मोरी, मृगी ठौर ते न टरी हैं। [3]
हरी - हरी लाल - लाल पीत - सेत सारी तन ,
पहिरैं सहेली सबै चित्र की सी खरी हैं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (49)
हे सखि! श्री लाड़ली-लाल दोनों ही अपने कुञ्ज से निकलकर यमुना के तट पर खड़े हुए हैं, और लाड़ली प्रिया आज कुछ विलक्षण छबि-छटा से युक्त हैं। [1]
उनके निशा-कालीन चिन्हों को देखकर रसनिधि प्रियतम मुस्कुरा उठे हैं। स्पष्ट है कि अलबेली प्रिया आज विशेष रंग-रस में ढली सी दिखती हैं। [2]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि छबि की परावधि में युगल को गलबहियाँ दिए देख कर श्री वन की हंसिनी, भ्रमरी, मयूरी और मृगी ठगी सी रह गई हैं। [3]
ऐसे ही हरित, लाल, पीत और श्वेत रन की साड़ियों में सुसज्जित सभी सखियाँ भी गति-विस्मृत हो चित्रवत् हो गई हैं। [4]

