धन - धन श्रीगुरुदेव गुसाँईं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (2)

धन - धन श्रीगुरुदेव गुसाँईं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (2)

धन - धन श्रीगुरुदेव गुसाँईं।
वृन्दावन रस - मग दरसायो ऊबट बाट छुटांईं॥ [1]
भूले हे बहुते जनमन के फिरत अंध की नांईं।
नागरिदास बसाये कुंजनि सबैं छुड़ाय दाँहनी बांईं॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (2)

श्री नागरीदास कह रहे हैं "श्री सतगुरु देव धन्य धन्य हैं, जिन्होंने नीरसता का मार्ग छुड़ा कर मुझे श्री वृन्दावन के उज्ज्वल रस मार्ग में आरूढ़ किया । [1]
बहुत जन्मो से भुला हुआ अंधे की भाँती संसार में भटक रहा था।" श्री नागरीदास कहते हैं "श्री सतगुरु देव ने मुझे हर दिशा से छुड़ा कर श्री वृन्दावन की कुंजों में बसा दिया है, ऐसे सतगुरु देव धन्य धन्य हैं।" [2]