प्रेमसात यात लोभ हर्षणेन मंडितां। प्रीतिरीति रासकेलि वर्धनाय पंडिताम्॥
प्रेयासी कदम्बमन्त रासदा विलासिनीं। राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (5)
हे श्री राधिका जू, आपका ह्रदय प्रेम से सुशोभित है, जिसके लोभ से सदैव श्री कृष्ण हर्षित रहते हैं। आप प्रेम की रीति में अति निपुण हैं और महारास क्रीड़ा में प्रेम वर्धन करनेवाली आचार्या हैं। आप श्री कृष्ण की प्रेयसी हैं, कदम्ब कुंजों की स्वामिनी हैं एवं रास विलास आदि में रमण करने वाली हैं। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।
प्रेयासी कदम्बमन्त रासदा विलासिनीं। राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (5)
हे श्री राधिका जू, आपका ह्रदय प्रेम से सुशोभित है, जिसके लोभ से सदैव श्री कृष्ण हर्षित रहते हैं। आप प्रेम की रीति में अति निपुण हैं और महारास क्रीड़ा में प्रेम वर्धन करनेवाली आचार्या हैं। आप श्री कृष्ण की प्रेयसी हैं, कदम्ब कुंजों की स्वामिनी हैं एवं रास विलास आदि में रमण करने वाली हैं। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।

