(राग कान्हरौ)
प्यारी तेरौ बदन अमृत की पंक तामें बींधे नैंन द्वै। [1]
चित चल्यौ काढ़नि कौं बिकच संधि संपुट में रह्यौ भ्वै॥ [2]
बहुत उपाइ आहि री प्यारी पै न करत स्वे। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी ऐसैंई रहौ ह्वै॥ [4]
-ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (7)
कुंजमहल में दोनों प्रिया प्रियतम विराज रहे हैं। प्यारे जी कह रहे हैं - हे प्यारी ! मेरे नयन तुम्हारे अमृत रूपी बदन कमल में फँस तुम्हारा रूप रस का पान कर रहे हैं। [1]
तुम्हारे मिलित स्तनयुगल के स्वरूप का अवलोकन करते मेरे नयन उनके रस में फँस गये हैं। [2]
उसी भाँति अन्य उपाय सब उपाय करके भी यह फँसे ही हुए हैं । [3]
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं कि कुंज बिहारी की यही चाह है कि प्यारी जी की रूप माधुरी में यह ऐसे ही रहें । [4]
प्यारी तेरौ बदन अमृत की पंक तामें बींधे नैंन द्वै। [1]
चित चल्यौ काढ़नि कौं बिकच संधि संपुट में रह्यौ भ्वै॥ [2]
बहुत उपाइ आहि री प्यारी पै न करत स्वे। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी ऐसैंई रहौ ह्वै॥ [4]
-ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (7)
कुंजमहल में दोनों प्रिया प्रियतम विराज रहे हैं। प्यारे जी कह रहे हैं - हे प्यारी ! मेरे नयन तुम्हारे अमृत रूपी बदन कमल में फँस तुम्हारा रूप रस का पान कर रहे हैं। [1]
तुम्हारे मिलित स्तनयुगल के स्वरूप का अवलोकन करते मेरे नयन उनके रस में फँस गये हैं। [2]
उसी भाँति अन्य उपाय सब उपाय करके भी यह फँसे ही हुए हैं । [3]
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं कि कुंज बिहारी की यही चाह है कि प्यारी जी की रूप माधुरी में यह ऐसे ही रहें । [4]

