तू बालक नहिं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (4)

तू बालक नहिं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (4)

तू बालक नहिं, भर्यौ सयानप काहे कृष्ण भजत नहिं निके। [1]
अतिव सुमिष्ट तजिव सुरभिन-पय मन बंधित तंदुल-जल फीके॥ [2]
(जैश्री) हित हरिवंश नर्क गति दुरभर यम द्वारै कटियत नक छीके। [3]
भव-अज कठिन, मुनिजन दुर्लभ, पावत क्यौं जु मनुज-तन भीके॥ [4]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (4)

तू बालक नहीं है और चतुरता से भरा हुआ है तो श्रीकृष्ण को भली प्रकार क्यों नही भजता? [1]
तू गाय के सुमधुर दूध को छोड़कर चावल के फीके पानी में अपने मन को बाँध रहा है! [2]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि नर्क की गति अत्यन्त कठिन है क्योंकि यम के द्वार पर छींकने पर नाक काटी जाती है (थोड़े से अपराध में कड़ा दंड सहन करना पड़ता है।) [3]
तू यह तो विचार कर कि शिवजी एवं ब्रह्मा को अप्राप्य तथा मुनिजनों को कठिनाई से मिलने वाला यह मनुष्य शरीर तू भीख में कैसे पा जायगा ? [4]
(इसको प्राप्त करने का कोई साधन किये बिना यह तुझको कैसे मिल जायगा ?)