मेरे मन दृग रीझि की, राधा ही कों बूझि।
राधा के मन रीझि की, मोहि बूझि अरु सूझि॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (70)
मेरे मन की इच्छा को श्री राधारानी तुरंत जान लेती हैं, और श्री राधारानी के हृदय की बात भी मेरे हृदय में तुरंत स्फुरित हो जाती है।
राधा के मन रीझि की, मोहि बूझि अरु सूझि॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (70)
मेरे मन की इच्छा को श्री राधारानी तुरंत जान लेती हैं, और श्री राधारानी के हृदय की बात भी मेरे हृदय में तुरंत स्फुरित हो जाती है।

