करि मन वृंदावनसौं हेत - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (91)

करि मन वृंदावनसौं हेत - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (91)

(राग सारंग)
करि मन वृंदावनसौं हेत। [1]
निसि दिन छिन छाया जिनि छाड़हि, रसिकनकौ रस-खेत।। [2]
जहँ श्रीराधा-मोहन विहरत, करि कुंजनि संकेत। [3]
पुलिन रास रस रंजित देखत, मन्मथ होत अचेत।। [4]
(श्री) वृंदावन तजि जे सुख चाहत, तेई राक्षस प्रेत। [5]
व्यास दासके उरमें बैठयौ, मोहन कहि-कहि देत।। [6]

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (91)

अरे मन तू वृन्दावन से स्नेह और नेह बढ़ा, जो रसिक संतों का खेत है जहाँ नित्य ही वृन्दावन रस प्रकट होता है। [1 & 2]
यहाँ श्री राधामोहन [दिव्य दंपति] विभिन्न वनों में विहार करते हैं, और उनके चरण चिन्हों से अंकित यह दिव्य भूमि है । [3]
यमुना जी के तट पर श्री राधा कृष्ण की रास लीला को देखकर हृदय स्तब्ध एवं गदगद हो जाता है। [4]
विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास कहते हैं जो जीव वृंदावन को त्याग कर सुख [रस] पाना चाहते हैं वह राक्षस और प्रेत हैं, इंसान भी नहीं हैं ।यह बात स्वयं श्री मोहन [श्री कृष्ण] ने उनके हृदय में बैठ कर कही है एवं लिखवायी है । [5 & 6]