मेरी गति तुही है लडैती प्रानप्यारीजू  - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (120)

मेरी गति तुही है लडैती प्रानप्यारीजू - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (120)

(राग जयजयवन्ती)
मेरी गति तुही है लडैती प्रानप्यारीजू। [1]
भई है प्रसन्न राधे हित हू को हित जानै
सकल गुन निधान परम उदारी जू ।। [2]
सहज सनेह दोऊ रूप ही को रस पीवैं
उँमगि उँमगि अंसनि भुज धारी जू । [3]
ललित रसिक वर सदा समीप रहैं
मिलत मिल्यो ही चाहैं जीवन हमारी जू ।। [4]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (120)

हे मेरी राधा रानी केवल आप ही मेरी गति हैं। [1]
आप अत्यंत मुझसे पसंद है एवं आप ही हैं जो मेरा हित जानती हैं, आप समस्त गुणों की खान हैं एवं परम उदार हैं । [2]
आप दोनों [राधा कृष्ण] सहज ही प्रेमी हैं, एवं रूप के रसिक हैं, एवं उमंग उमंग कर एक दूसरे को अँसो में धारण किए हुए हैं । [3]
रसिकवर स्वामी श्री हरिदास [ललिता अवतार] नित्य ही युगल जोड़ी के समीप विराजमान हैं, वह नित्य ही युगल जोड़ी के मिलन की चाह करते हैं, वही हमारी जीवनी है [नित्य विहार रस]। [4]