उज्जृम्भमाणरसवारिनिधेस्तरङ्गैरंगैरिव प्रणयलोलविलोचनायाः।
तस्याः कदा नु भविता मयि पुण्यदृष्टिर्वृन्दाटवीनवनिकुञ्जगृहाधिदेव्याः॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (11)
जिनके नेत्र प्रणय-रस से चञ्चल हो रहे हैं और जिनके अङ्ग उत्फुल्लमान् रस-सागर की तरङ्गों के समान हैं, उन श्रीवृन्दाटवी नव- निकुञ्ज भवन की अधिष्ठात्री देवी की पवित्र दृष्टि मुझ पर कब होगी?
तस्याः कदा नु भविता मयि पुण्यदृष्टिर्वृन्दाटवीनवनिकुञ्जगृहाधिदेव्याः॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (11)
जिनके नेत्र प्रणय-रस से चञ्चल हो रहे हैं और जिनके अङ्ग उत्फुल्लमान् रस-सागर की तरङ्गों के समान हैं, उन श्रीवृन्दाटवी नव- निकुञ्ज भवन की अधिष्ठात्री देवी की पवित्र दृष्टि मुझ पर कब होगी?

