(राग कान्हरौ)
एक समै एकांत बन में करत सिंगार परस्पर दोई।
वे उनके वे उनके प्रतिबिंबनि देखत रहत परस्पर भोई॥ [1]
जैसैं नीके आजु बनैं ऐसौं कबहूँ न बनैं
आरसी सब झूँठी परी कैसीयैब कोई॥ [2]
श्री हरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी रीझि परस्पर प्रीनि नोई॥ [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (13)
एक समय एकांत वन में प्रिया प्रियतम [श्री राधा कृष्ण] एक दूसरे का शृंगार कर, एक दूसरे का प्रतिबिम्ब देख रहे हैं । [1]
जैसा आज का श्रृंगार है वैसा अद्भुत श्रृंगार पहले कभी नहीं देखा, आज के श्रृंगार के सामने तो मानो आईना ही झूठा पड़ गया [आईना भी असमर्थ है आज के श्रृंगार की शोभा को चित्रित करने के लिए] । [2]
ललिता अवतार श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं कि तत्पश्चात श्री राधा कृष्ण एक दूसरे पर रीझ कर विहार [प्रेम] में तल्लीन हो एक हो गए । [3]
एक समै एकांत बन में करत सिंगार परस्पर दोई।
वे उनके वे उनके प्रतिबिंबनि देखत रहत परस्पर भोई॥ [1]
जैसैं नीके आजु बनैं ऐसौं कबहूँ न बनैं
आरसी सब झूँठी परी कैसीयैब कोई॥ [2]
श्री हरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी रीझि परस्पर प्रीनि नोई॥ [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (13)
एक समय एकांत वन में प्रिया प्रियतम [श्री राधा कृष्ण] एक दूसरे का शृंगार कर, एक दूसरे का प्रतिबिम्ब देख रहे हैं । [1]
जैसा आज का श्रृंगार है वैसा अद्भुत श्रृंगार पहले कभी नहीं देखा, आज के श्रृंगार के सामने तो मानो आईना ही झूठा पड़ गया [आईना भी असमर्थ है आज के श्रृंगार की शोभा को चित्रित करने के लिए] । [2]
ललिता अवतार श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं कि तत्पश्चात श्री राधा कृष्ण एक दूसरे पर रीझ कर विहार [प्रेम] में तल्लीन हो एक हो गए । [3]

