(राग सारंग)
भगतकौ कहा सीकरी काम। [1]
आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरिनाम॥ [2]
जाको मुख देखे दुख लागै ताकों करन परी परनाम। [3]
कुंभनदास लाल गिरधर बिन यह सब झूठौ धाम॥ [4]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (397)
भक्तों को किसी राज महल से क्या प्रयोजन है ? (यहाँ सीकरी का अर्थ अकबर के फ़तेहपुर सीकरी से है, जब श्री कुंभन दास जी को अकबर ने अपने राज महल न्यौता भेजकर बुलाया था, उस समय का यह पद है ) [1]
कहीं आने जाने से व्यर्थ समय की बर्बादी है, एवं अप यश ही मिलता है, और हरिनाम [प्रभु का नाम] भी बिसर जाता है । [2]
जिन लोगों का मुख देखने से भी दुःख लगता है, ऐसे संसारी लोगों को प्रणाम करना पड़ता है । [3]
श्री कुंभन दास जी कहते हैं कि लाल गिरिधारी के बिना [जहां श्री कृष्ण का गुणगान ना होता हो] हर धाम झूठा है । [4]
भगतकौ कहा सीकरी काम। [1]
आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरिनाम॥ [2]
जाको मुख देखे दुख लागै ताकों करन परी परनाम। [3]
कुंभनदास लाल गिरधर बिन यह सब झूठौ धाम॥ [4]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (397)
भक्तों को किसी राज महल से क्या प्रयोजन है ? (यहाँ सीकरी का अर्थ अकबर के फ़तेहपुर सीकरी से है, जब श्री कुंभन दास जी को अकबर ने अपने राज महल न्यौता भेजकर बुलाया था, उस समय का यह पद है ) [1]
कहीं आने जाने से व्यर्थ समय की बर्बादी है, एवं अप यश ही मिलता है, और हरिनाम [प्रभु का नाम] भी बिसर जाता है । [2]
जिन लोगों का मुख देखने से भी दुःख लगता है, ऐसे संसारी लोगों को प्रणाम करना पड़ता है । [3]
श्री कुंभन दास जी कहते हैं कि लाल गिरिधारी के बिना [जहां श्री कृष्ण का गुणगान ना होता हो] हर धाम झूठा है । [4]

