सोई रहै महा आनंद में एक लाडिली जाहि राखै - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (99)

सोई रहै महा आनंद में एक लाडिली जाहि राखै - श्री ललित किशोरी देव, सिद्धांत के पद (99)

सोई रहै महा आनंद में एक लाडिली जाहि राखै  ।
और उपाव करौ किन कोऊ गौर स्याम रस रूप न चाखै ।। [1]
निरखैं केलि निकुंज माधुरी जाहि प्रिया अपनों करि राखै ।
श्रीहरिदासी रसिक-सिरोमनि सबही विधि पुजवति अभिलाखै ।। [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (99)

वही जन ही केवल महा आनंद [रस में सराबोर] में रहता है जिसे प्राणप्यारी श्री राधारानी रखती हैं और कोई नहीं रह सकता । श्री  राधा रानी की कृपा के बिना आप कोई भी उपाय कर डालो सब व्यर्थ है, गौर श्याम [युगल रस] रस आप आस्वादन ही नहीं कर सकते । [1]
केवल  वही जन केलि निकुंज माधुरी को निरख सकता है जिसे श्री राधारानी अपना बना लें। रसिक शिरोमणि श्री हरिदासी जी की प्राण प्यारी श्री राधारानी समस्त प्रकार से अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली हैं। [2]