(दोहा)
ठाढ़े गाढ़े कुंज तर, बाढ़े मैन मरोर ।
भीजत कब इन दृगन ते, देषौं जुगल किसोर॥
(पद) [राग मल्हार - एकताल]
भीजत कब देखौं इन नैना ।
श्यामा जू की सुरंग चुनरिया , मोहन को उपरैंना ॥
जुगल किशोर कूंजतर ठाड़े , जतन कियो कछु मैं ना ।
उमड़ी घटा चहूँ दिसि श्रीभट्ट घिरि आई जल सेना ॥
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (88)
(दोहा)
वर्षा से बचने के लिए श्रीप्रिया-प्रियतम सघन कुंजों के नीचे खड़े हैं, जहाँ कामदेव भी आनन्द-वृद्धि की सेवा कर रहा है। ऐसे श्रीयुगलकिशोर (श्रीराधा-कृष्ण) को वर्षा में भींजते हुए, आपस में लिपटे हुए, कब इन नैनों से देखूँगा?
(पद)
भावार्थ- श्री भट्ट देवाचार्य जी पद गायन करते करते ये भाव कर रहे थे की," मैं कब यह देखूंगा की सुन्दर सुन्दर मेघ आ गए हैं और रिमझिम रिमझिम वर्षा हो रही हैं और श्री लाड़ली जू की सुरंग चूनरी और लाल जू का उपरैंना (पीताम्बर) भींज रहा हैं । और जुगल किशोर निकुञ्ज में एक लता के नीचे खड़े भींज रहे हैं। हाय ! मैंने (श्री भट्टदेवाचार्य जी) उनको भींजने से बचाने का कुछ उपाय भी नहीं किया ? वो (श्री भट्टदेवाचार्य जी) इतना सोच ही रहे थे की तत्काल मेघ छा गए,रिमझिम रिमझिम वर्षा होने लगी और दिव्य निकुंज का प्रादुर्भाव हो गया।
ठाढ़े गाढ़े कुंज तर, बाढ़े मैन मरोर ।
भीजत कब इन दृगन ते, देषौं जुगल किसोर॥
(पद) [राग मल्हार - एकताल]
भीजत कब देखौं इन नैना ।
श्यामा जू की सुरंग चुनरिया , मोहन को उपरैंना ॥
जुगल किशोर कूंजतर ठाड़े , जतन कियो कछु मैं ना ।
उमड़ी घटा चहूँ दिसि श्रीभट्ट घिरि आई जल सेना ॥
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (88)
(दोहा)
वर्षा से बचने के लिए श्रीप्रिया-प्रियतम सघन कुंजों के नीचे खड़े हैं, जहाँ कामदेव भी आनन्द-वृद्धि की सेवा कर रहा है। ऐसे श्रीयुगलकिशोर (श्रीराधा-कृष्ण) को वर्षा में भींजते हुए, आपस में लिपटे हुए, कब इन नैनों से देखूँगा?
(पद)
भावार्थ- श्री भट्ट देवाचार्य जी पद गायन करते करते ये भाव कर रहे थे की," मैं कब यह देखूंगा की सुन्दर सुन्दर मेघ आ गए हैं और रिमझिम रिमझिम वर्षा हो रही हैं और श्री लाड़ली जू की सुरंग चूनरी और लाल जू का उपरैंना (पीताम्बर) भींज रहा हैं । और जुगल किशोर निकुञ्ज में एक लता के नीचे खड़े भींज रहे हैं। हाय ! मैंने (श्री भट्टदेवाचार्य जी) उनको भींजने से बचाने का कुछ उपाय भी नहीं किया ? वो (श्री भट्टदेवाचार्य जी) इतना सोच ही रहे थे की तत्काल मेघ छा गए,रिमझिम रिमझिम वर्षा होने लगी और दिव्य निकुंज का प्रादुर्भाव हो गया।

