हरि राधा वृंदाविपिन - श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (1)

हरि राधा वृंदाविपिन - श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (1)

हरि राधा वृंदाविपिन, नितबिहार रस एक।
बिछुरत नाहीं पलक हूँ, बीतत कलप अनेक॥

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (1)

श्री राधा-कृष्ण वृन्दावन में नित्य ही विहार-रस बरसाते रहते हैं; अनन्त कल्प बीत चुके हैं, पर वे एक क्षण के लिए भी कभी बिछुड़ते नहीं।