छबीली रंगीली रस आगरी किसोरी गोरी,
राख निज ओरी मति मोरी यह धीजिये। [1]
नागरी उजागरी जू सदां रूप आगरी जू,
'लाल बलबीर' दया दासन पर कीजिए॥ [2]
कीरति दुलारी मनमोहन की प्राण प्यारी,
करूँ मनुहारी बिनै एती सुन लीजिये। [3]
मेरी यह आस पूरी कीजै सुखरास सदां,
हिय में हुलास बास वृन्दावन दीजिये॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (87)
हे छबीली, रंगीली और रस की आगरी, श्री राधे, मेरी मति (बुद्धि) को ऐसा बना दीजिये कि यह आपकी इच्छा में ही इच्छा रखे। [1]
हे नागरी, उजागरी और रूप की आगरी, श्री राधे, अपने इस दास पर दया कीजिये। [2]
हे कीर्ति दुलारी, मनमोहन की प्राण-प्यारी राधे, मेरी केवल इतनी मनुहार सुन लीजिये। [3]
मेरे हृदय में उल्लास भर कर मुझे निज धाम वृंदावन में नित्य वास दीजिये, हे सुखराशि, श्री राधे, मेरी यह आशा पूर्ण कर दीजिये। [4]

