(राग विहागरौ)
रस भरे लाल रस भरी राधे,
रस भरी सखी अवलोकत रंगहि।
मदन हुलास बाढ़यौ प्रीतम मन,
अतिहि चाव सौं भरत उछंगहि । [1]
अद्भुत कोक-कलनि की उमगनि,
लज्जित करत अनंगहि।
‘हित ध्रुव’ चतुर सिरोमनि दोऊ,
विलसत प्रेम-तरंगहि। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (61)
रस-पूरित लाल एवं रस-पूरित प्रिया की रंग-केलि का रस-पूरित सखियाँ अवलोकन कर रहीं हैं। प्रियतम के मन में मदनोल्लास की वृद्धि हो रही है, अतः वे उत्साहपूर्वक प्रिया को बारम्बार अपनी गोद में ले रहे हैं। [1]
युगल में कोक-कलाओं का यह अद्भुत उदगम कामदेव को भी लज्जित कर रहा है। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि कोक-कलाओं में चतुर शिरोमणि-युगल इन प्रेम लहरियों में मग्न हुए विलास करते रहते हैं। [2]
रस भरे लाल रस भरी राधे,
रस भरी सखी अवलोकत रंगहि।
मदन हुलास बाढ़यौ प्रीतम मन,
अतिहि चाव सौं भरत उछंगहि । [1]
अद्भुत कोक-कलनि की उमगनि,
लज्जित करत अनंगहि।
‘हित ध्रुव’ चतुर सिरोमनि दोऊ,
विलसत प्रेम-तरंगहि। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (61)
रस-पूरित लाल एवं रस-पूरित प्रिया की रंग-केलि का रस-पूरित सखियाँ अवलोकन कर रहीं हैं। प्रियतम के मन में मदनोल्लास की वृद्धि हो रही है, अतः वे उत्साहपूर्वक प्रिया को बारम्बार अपनी गोद में ले रहे हैं। [1]
युगल में कोक-कलाओं का यह अद्भुत उदगम कामदेव को भी लज्जित कर रहा है। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि कोक-कलाओं में चतुर शिरोमणि-युगल इन प्रेम लहरियों में मग्न हुए विलास करते रहते हैं। [2]

