तू रिस छाँड़ि री राधे राधे - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (17)

तू रिस छाँड़ि री राधे राधे - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (17)

(राग कान्हरौ एवं धनाश्री)
तू रिस छाँड़ि री राधे राधे। [1]
ज्यौं ज्यौं तोकौं गहरु त्यौं त्यौं मोकौं बिथा री साधे साधे॥ [2]
प्राननि कौ पोषत है री तेरे बचन सुनियत आधे आधे। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी तेरी प्रीति बाँधे बाँधे॥ [4]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (17)

श्री कुंज बिहारी लाल प्यारी जू से कहते हैं कि हे राधे, हे राधे, आप अपना मान त्याग दीजिए । [1]
आपका मान जितना जितना बढ़ता है उतना उतना मुझे कष्ट होता है । [2]
आपके मधुर वचन ही मेरे प्राणों का पोषण करते हैं । [3]
श्री हरिदास जी के स्वामी श्री श्याम सुंदर श्यामा जू से कहते हैं कि आपकी प्रीति मुझे नित्य ही वश में करके रखती है। [4]