तुम बिन नैंना ना सुखी, कुंजबिहारिनी प्राण।
अंतरगती जानत सबै, कहा मैं करों बखान॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धान्त की साखी (265)
हे प्राणप्यारी श्री कुंजबिहारिनी जू! आपको देखे बिना मेरे नेत्र कहीं भी सुख नहीं पाते। मेरे हृदय की व्यथा आप सब जानती हैं, फिर और मैं क्या कहूँ?
अंतरगती जानत सबै, कहा मैं करों बखान॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धान्त की साखी (265)
हे प्राणप्यारी श्री कुंजबिहारिनी जू! आपको देखे बिना मेरे नेत्र कहीं भी सुख नहीं पाते। मेरे हृदय की व्यथा आप सब जानती हैं, फिर और मैं क्या कहूँ?

