विपिन अलौकिक लोक में, अति अभूत रसकन्द।
नव किसोर इक वैस द्रुम, फूले रहत सुछन्द॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (35)
इस लोक में प्रकट होते हुए भी वृन्दावन अलौकिक, परमाद्भुत और सरस है, जिसमें नवल किशोर दो ऐसे समवयस वृक्षों की भाँति सुफलित हैं, जिनकी फूलनियाँ सतत वर्धमान हैं।

