नैन मिलाकर मोहन सों, वृषभानु लली मन में मुसकानी।
भौंह मरोर कै दूसरि ओर, कछु वह घूंघट में शरमानी॥ [1]
देखि निहाल भई सजकी, वह सूरतिया मन मांहि समानी।
हमें औरन की परवाह नहीं अपनी ठकुरानी है राधिका रानी॥ [2]
- ब्रज के सवैया
जब श्रीकृष्ण के नयन श्रीराधिका के नयनों से मिले, तब वृषभानु ललि मन ही मन मुस्कुरा उठीं। संकोचवश उन्होंने दृष्टि फेर ली और घूँघट से अपने मुख को ढक लिया, लज्जा से भर गईं। [1]
श्रीराधिका की इस अद्भुत लीला को देखकर सखियाँ आनंदित हो उठीं। उनके हृदयों में यह सुंदर छवि अमिट हो गई और वे श्री राधिका के प्रेम में मग्न हो गईं। उनके लिए अब कोई अन्य नहीं, उनकी ठकुरानी केवल श्री राधिका महारानी ही हैं। [2]
श्रीराधिका की इस अद्भुत लीला को देखकर सखियाँ आनंदित हो उठीं। उनके हृदयों में यह सुंदर छवि अमिट हो गई और वे श्री राधिका के प्रेम में मग्न हो गईं। उनके लिए अब कोई अन्य नहीं, उनकी ठकुरानी केवल श्री राधिका महारानी ही हैं। [2]

