चंपक बरन मृगलोचनी सलोनी राधे - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (86)

चंपक बरन मृगलोचनी सलोनी राधे - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (86)

(कवित्त)
चंपक बरन मृगलोचनी सलोनी राधे,
और की न आस मेरें तुही है उपास री। [1]
 मेटौ जग त्रास कीजै कुमति को नास,
मोहि जान निज दास करौ हिये मैं प्रकास री॥ [2]
'लाल बलबीर' जन धीरज-धरैनी मन,
तोसी तौ तुही हैं और काकी करौं आस री। [3]
पूरी कर आस मेरी एहो, सुखरास मोकौं,
कृपा करि दीजै सदाँ वृन्दावन बास री॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (86)

हे चंपक वरनी, मृगलोचनी, और सलोनी श्री राधे, मुझे केवल और केवल आपकी ही आशा है, मेरी इष्ट तो केवल आप ही हैं। [1]

मेरे भय को मिटा दीजिए, मेरी कुमति का नाश कीजिए, और मुझे अपना निज दास जानकर मेरे हृदय में प्रकाश कीजिए। [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि हे नित्य बिहारिणी, अलबेली सरकार, श्री राधिका जी, आप जैसी तो केवल आप ही हैं (अर्थात् आपकी समानता और कौन कर सकता है), फिर मैं और किससे आशा करूँ? आप पतितों को हृदय से लगाती हैं, और मेरा जीवन केवल आप तक ही सीमित है, इसलिए मेरे हृदय में अत्यंत धीरज बंध रहा है। [3]

हे सुख राशि, मेरी केवल यही विनती और आशा है कि कृपा करके मुझे नित्य ही वृंदावन का वास दीजिए। [4]