(राग कान्हरौ)
भूलैं-भूलैं मान न करि री प्यारी,
तेरी भौंहें मैली देखति प्रान न रहततन। [1]
ज्यौं न्यौछावर करौं प्यारी तो पै,
काहे तैं तू मूकी कहत श्यामघन॥ [2]
तोहि ऐसैं देखत मोहिंब
कल कैसें होइ जु प्रान-धन। [3]
सुनि हरिदास काहे न कहत,
सौं छाँड़िब छाँड़ि आपनौं पन॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (10)
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं, जब श्री हरिदासी [ललिता सखी] भी उनके पास ही खड़ी हैं ।
हे राधे, भूल से भी आप हमसे मान मत कीजिये! जब मैं आपकी भौंहों चढ़ी हुई [मान अवस्था] को देखता हूँ तब मेरे प्राण ही निकल जाते हैं। [1]
श्री श्याम सुन्दर पुन: कहते हैं कि मैं अपना सर्वस्व आप पर न्यौछावर करता हूँ, हे प्यारी जू, आप चुप क्यों हो? [2]
जब मैं आपको इस अवस्था में देखता हूँ तब मुझे एक क्षण को भी सुख अनुभव नहीं होता, आप ही मेरी प्राण धन हो। [3]
सुनो, हे हरिदासी, आप श्री प्यारी जू को अपना मान छोड़ने के लिए क्यों नहीं कहती? [4]
भूलैं-भूलैं मान न करि री प्यारी,
तेरी भौंहें मैली देखति प्रान न रहततन। [1]
ज्यौं न्यौछावर करौं प्यारी तो पै,
काहे तैं तू मूकी कहत श्यामघन॥ [2]
तोहि ऐसैं देखत मोहिंब
कल कैसें होइ जु प्रान-धन। [3]
सुनि हरिदास काहे न कहत,
सौं छाँड़िब छाँड़ि आपनौं पन॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (10)
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं, जब श्री हरिदासी [ललिता सखी] भी उनके पास ही खड़ी हैं ।
हे राधे, भूल से भी आप हमसे मान मत कीजिये! जब मैं आपकी भौंहों चढ़ी हुई [मान अवस्था] को देखता हूँ तब मेरे प्राण ही निकल जाते हैं। [1]
श्री श्याम सुन्दर पुन: कहते हैं कि मैं अपना सर्वस्व आप पर न्यौछावर करता हूँ, हे प्यारी जू, आप चुप क्यों हो? [2]
जब मैं आपको इस अवस्था में देखता हूँ तब मुझे एक क्षण को भी सुख अनुभव नहीं होता, आप ही मेरी प्राण धन हो। [3]
सुनो, हे हरिदासी, आप श्री प्यारी जू को अपना मान छोड़ने के लिए क्यों नहीं कहती? [4]

