लाड़ी जू थारौ,अविचल रहौ जी सुहाग - श्री हित रूप लाल जी महाराज

लाड़ी जू थारौ,अविचल रहौ जी सुहाग - श्री हित रूप लाल जी महाराज

(आशीष का पद)
लाड़ी जू थारौ,अविचल रहौ जी सुहाग। [1]
अलक लड़े रिझवार छैल सौं,नित नव बढौ अनुराग।। [2]
यौं नित विहरौ ललितादिक सँग, वृंदावन निजु बाग। [3]
'रूप अली' हित जुगल नेह लखि, मानति निजु बड़भाग।। [4]

- श्री हित रूप लाल जी महाराज

इष्ट-तत्व को आशीष देकर उनके सुख की अभिलाषा करना वृन्दावन की प्रेम-पद्धति का भूषण है, अतएव नव-दम्पति को आशीष देती हुईं सखियाँ कहती हैं कि-"हे लाड़िली जू ! आपका दाम्पत्य सौभाग्य सदा-सर्वदा अचल रहे। [1]

विलक्षण लाड़िले रिझवार छैल प्रियतम से आपका नित्य नव अनुराग बढ़ता ही रहे। [2]

ललितादिक सहचरियों के साथ अपनी निजु-वाटिका वृन्दावन में इसी प्रकार आप सदा विहार-परायण रहें। [3]

श्री हित रूपलाल जी कहते हैं कि आपके नव-दाम्पत्यमय युगल रूप का पारस्परिक प्रेम-दर्शन करके हम सब सखियाँ अपना सहज अहो-भाग्य अनुभव करती हैं। [4]