धरो मन, भानुलली को ध्यान । [1]
जाको ध्यान धरत निशिवासर, सुंदर श्याम सुजान ।। [2]
कनक मुकुट सिर चारु चंद्रिका, तापर लर मुक्तान । [3]
चूनरि जरिन किनार गौर तनु, नीलांबर परिधान ।। [4]
श्रुति ताटंक गुंथी वर वेणी, लजवति भौंह कमान । [5]
नासा भल मुक्ताहल सोहति, मन मोहति मुसकान ।। [6]
पग पायल गति अति अभिरामिनि, लखि मराल सकुचान । [7]
पाय ‘कृपालु’ सरस अस स्वामिनि, चरन न कस लपटान ।। [8]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (21)
अरे मन ! तू निरन्तर ही वृषभानुनंदिनी राधिकाजी का ध्यान किया कर । [1]
जिनका ध्यान साक्षात् ब्रह्म श्री श्यामसुन्दर भी निरंतर करते रहते हैं । [2]
जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट एवं मनोहर चंद्रिका तथा उसके ऊपर भी मोतियों की लड़ शोभा दे रही है । [3]
जिनकी जरी – किनारे की चुनरी तथा गौर वर्ण पर नीले रंग का वस्त्र धारण किये हुए हैं । [4]
जिनके कान में झुमके झूल रहे हैं तथा अत्यन्त ही सुन्दर रीति से वेणी गुँथी हुई है । एवं जिनकी भौंहें धनुष को लज्जित कर रही हैं । [5]
जिनकी नासिका में सुन्दर मुक्ताहल शोभित हो रहा है एवं जो मुस्कुराती हुई मन को हठात् मोहित कर लेती हैं । [6]
जिनके पैरों में पायल हैं तथा जिनकी चाल हंसों को भी लज्जित करने वाली अत्यन्त मतवाली है । [7]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि ऐसी परम मधुर स्वामिनी को पाकर भी, अरे मन ! तू उनके चरणों में सदा के लिए क्यों नहीं लिपट गया ? [8]
जाको ध्यान धरत निशिवासर, सुंदर श्याम सुजान ।। [2]
कनक मुकुट सिर चारु चंद्रिका, तापर लर मुक्तान । [3]
चूनरि जरिन किनार गौर तनु, नीलांबर परिधान ।। [4]
श्रुति ताटंक गुंथी वर वेणी, लजवति भौंह कमान । [5]
नासा भल मुक्ताहल सोहति, मन मोहति मुसकान ।। [6]
पग पायल गति अति अभिरामिनि, लखि मराल सकुचान । [7]
पाय ‘कृपालु’ सरस अस स्वामिनि, चरन न कस लपटान ।। [8]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (21)
अरे मन ! तू निरन्तर ही वृषभानुनंदिनी राधिकाजी का ध्यान किया कर । [1]
जिनका ध्यान साक्षात् ब्रह्म श्री श्यामसुन्दर भी निरंतर करते रहते हैं । [2]
जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट एवं मनोहर चंद्रिका तथा उसके ऊपर भी मोतियों की लड़ शोभा दे रही है । [3]
जिनकी जरी – किनारे की चुनरी तथा गौर वर्ण पर नीले रंग का वस्त्र धारण किये हुए हैं । [4]
जिनके कान में झुमके झूल रहे हैं तथा अत्यन्त ही सुन्दर रीति से वेणी गुँथी हुई है । एवं जिनकी भौंहें धनुष को लज्जित कर रही हैं । [5]
जिनकी नासिका में सुन्दर मुक्ताहल शोभित हो रहा है एवं जो मुस्कुराती हुई मन को हठात् मोहित कर लेती हैं । [6]
जिनके पैरों में पायल हैं तथा जिनकी चाल हंसों को भी लज्जित करने वाली अत्यन्त मतवाली है । [7]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि ऐसी परम मधुर स्वामिनी को पाकर भी, अरे मन ! तू उनके चरणों में सदा के लिए क्यों नहीं लिपट गया ? [8]

