लाल लाड़िली प्रेम तें, सरस सखिनु कौ प्रेम।
अटकी हैं निज प्रीति रस, परसत तिनहिं न नेम॥
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, प्रेम लता (46)
श्री राधा-कृष्ण के परस्पर प्रेम से भी अधिक रसमय इन नित्य-विहार की सखियों का प्रेम है। ये सखियाँ अपने निज प्रीति-रस में इस प्रकार मग्न और अटकी हुई हैं कि कोई भी नियम, मर्यादा या विधि-विधान उन्हें स्पर्श तक नहीं कर पाता। उनका प्रेम समस्त बंधनों से परे, स्वसुख से अछूता, केवल युगल के तत्सुख में ही स्थित है।
अटकी हैं निज प्रीति रस, परसत तिनहिं न नेम॥
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, प्रेम लता (46)
श्री राधा-कृष्ण के परस्पर प्रेम से भी अधिक रसमय इन नित्य-विहार की सखियों का प्रेम है। ये सखियाँ अपने निज प्रीति-रस में इस प्रकार मग्न और अटकी हुई हैं कि कोई भी नियम, मर्यादा या विधि-विधान उन्हें स्पर्श तक नहीं कर पाता। उनका प्रेम समस्त बंधनों से परे, स्वसुख से अछूता, केवल युगल के तत्सुख में ही स्थित है।

