(कवित्त)
चंदन लिपायो चौक, चाँदनी चँदोवे तामें,
चाँदनी बिछौना फैली लहर सुगंद की। [1]
चाँदनी की साज नीकी चंद-सम चमकन,
चारों ओर चंद्रमुखी चंद-जोति मंद की॥ [2]
चाँदनी-सी चार चारु चाँदनी-सी फैली 'हठी',
चाँदनी-सी-हाँसी, कै मिठाई सुधा कंद की। [3]
चंदन की चौकी बैठी चंदन लगाय भाल,
चंद-से वदन राधे रानी ब्रजचंद की॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (17)
जिस आँगन में श्री राधे विराजमान हैं, वहाँ चंदन का लेप लगा हुआ है, वहाँ चंद्र की उजियारी चाँदनी है, और चाँदनी के समान ही बिछौना है, जिसकी सुगंध की लहर से पूरा आँगन सुगंधित हो रहा है। [1]
चंदन लिपायो चौक, चाँदनी चँदोवे तामें,
चाँदनी बिछौना फैली लहर सुगंद की। [1]
चाँदनी की साज नीकी चंद-सम चमकन,
चारों ओर चंद्रमुखी चंद-जोति मंद की॥ [2]
चाँदनी-सी चार चारु चाँदनी-सी फैली 'हठी',
चाँदनी-सी-हाँसी, कै मिठाई सुधा कंद की। [3]
चंदन की चौकी बैठी चंदन लगाय भाल,
चंद-से वदन राधे रानी ब्रजचंद की॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (17)
जिस आँगन में श्री राधे विराजमान हैं, वहाँ चंदन का लेप लगा हुआ है, वहाँ चंद्र की उजियारी चाँदनी है, और चाँदनी के समान ही बिछौना है, जिसकी सुगंध की लहर से पूरा आँगन सुगंधित हो रहा है। [1]
हर तरफ़ चाँदनी ही चाँदनी छाई हुई है, जो चंद्रमा के समान चमक रही है, चारों ओर चंद्रमुखी ही दिख रही हैं, जिसे देख कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे चंद्रमा की ज्योति भी हेय प्रतीत हो। [2]
चारों ओर से चाँदनी का ही आकर्षण है, श्री राधा जू जब मुस्कुराती हैं, तो उनकी मधुर मुस्कान भी चाँदनी समान है और अमृत रस की मिठाई के समान है। [3]
श्री हठी जी कहते हैं कि ब्रजचंद्र की हमारी श्री राधे रानी चंदन के आँगन में बैठी हैं, जिनके माथे पर भी चंदन ही लगा हुआ है, और जिनका बदन चंद्र के समान है। [4]

