श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी का जीवन परिचय

श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी का जीवन परिचय

जन्म एवं बाल्यकाल:
श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी मथुरा में आदि गौर ब्राह्मण कुल में जन्में थे। उनका उपस्थिति काल 14वीं शताब्दी में माना जाता है। पर अधिकतर विद्वान उन्हें सोलहवीं शताब्दी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ में उपस्थित मानते है ।

आध्यात्मिक जीवन:
श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने श्रीभट्टदेवाचार्य जी से उन्हें अपना निजदास बनाने की प्रार्थना की, तब श्रीभट्टदेवाचार्य जी ने उनसे पूछा की आपको हमारी गोद में क्या दिख रहा है ? तब श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने उत्तर दिया की- " कुछ नहीं "। तब श्रीभट्टदेवाचार्य जी उन्हें 12 वर्ष के लिए रीतिपूर्वक श्री गिरिराज महाराज की परिक्रमा का आदेश दिया । 12 वर्ष तक श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने रीतिपूर्वक श्री गिरिराज महाराज की परिक्रमा दी फिर श्रीभट्टदेवाचार्य जी के पास आये ।
तब पुनः श्रीभट्टदेवाचार्य जी ने उनसे पूछा की आपको हमारी गोद में क्या दिख रहा है ?
तब भी श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने उत्तर दिया की- " कुछ नहीं "।
तदुपरांत श्रीभट्टदेवाचार्य जी उन्हें पुनः 12 वर्ष के लिए रीतिपूर्वक श्री गिरिराज महाराज की परिक्रमा का आदेश दिया । 12 वर्ष तक श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने रीतिपूर्वक श्री गिरिराज महाराज की परिक्रमा दी फिर श्रीभट्टदेवाचार्य जी के पास आये ।
तब पुनः श्रीभट्टदेवाचार्य जी ने उनसे पूछा की आपको हमारी गोद में क्या दिख रहा है ?
श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने उत्तर दिया की- " आपकी गोद में प्रिया प्रियतम दिख रहे हैं ।"
तब जाकर श्रीभट्टदेवाचार्य जी ने श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी को शरणागति दी ( निजदास बनाया ) ।

श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी, श्रीभट्टदेवाचार्य जी के पश्‍चात् निम्बार्क सम्प्रदाय के आचार्य हए थे । श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी ने निम्बार्क सम्प्रदाय की बडी उन्नति की । उन्होंने ग्रन्थों की रचना कर और अनेकों मठ - मन्दिर और शिष्य बनाकर सम्प्रदायका जितना विस्तार किया, उतना शायद उनके पूर्व या उनके बाद किसी ने नहीं किया ।
श्रीहरिव्यासदेवजी का तिरोधान मथुरा में ही हुआ । नारद - टीला पर श्रीकेशव काशमीरी भट्टजी और श्रीभट्टजीकी समाधियों के पास उनकी भी समाधि है ।

शिष्य परम्परा:
उनके शिष्यों में 12 प्रधान थे, जिनसे निम्बार्क सम्प्रदाय के १२ द्वारे (शाखाएँ) चले । वे 12 शिष्य थे - १. श्रीस्वभूरामजी, २. श्रीवोहितजी, ३. श्रीमदनगोपालजी, ४. श्रीउद्धवजी ( घमण्डीजी) । ५. श्रीबाहुबलजी, ६. श्रीपरशुरामजी, ७. श्रीगोपालजी, ८. श्रीहषीकेशजी, ९. श्रीमाधवजी, १०. श्रीकेशवजी, ११. श्री (लापर) गोपालजी और १२ . श्रीमुकन्दजी ।
इनमें श्रीस्वभूरामजी और श्रीपरशुरामजी के द्वारे का सर्वाधिक विस्तार हुआ । निम्बार्क सम्प्रदायके प्रसिद्ध सन्त नागाजी, श्रीस्वभूरामजी की परम्परा में और श्रीतत्ववेत्ताजी, श्रीपरशुरामजी की परम्परा में हुए ।

रचित ग्रन्थ:
हरिव्यास देवाचार्य एक प्रख्यात धर्माचार्य और उच्चकोटि के विद्वान और कवि भी थे । उन्होंने संस्कृत के कई छोटे ग्रंथों की रचना की है । ' सिद्धान्त रत्नाजंलि 'उनका प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थ है । उसी प्रकार ' महावाणी ' उनका व्रजभाषा का प्रसिद्ध ग्रन्थ है जो रसिकों की दृष्टि से उच्च कोटि का ग्रंथ है जिसे समस्त रसिक अनुगमन करते हैं । ' सिद्धान्त रत्नाजंलि ' श्रीनिम्बार्काचार्य की ' दश श्लोकी ' की टीका है । ' महावाणी ' श्रीभटटजीके ' युगल शतक ' का भाष्य माना जाता है । इसमें निम्बार्क सम्प्रदाय के भक्ति - सिद्धान्त , उपासना पद्धति और उपास्य तत्व का विशुद्ध वर्णन है ।

लीलाएं:
श्री हरिव्यासदेव के जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है , जिसे नाभाजी और प्रियादासजी ने भी लिखा है । घटना इस प्रकार है । एक बार वे सन्तों के साथ विचरण करते हरियाणा - पंजाब की ओर गये । जब वे ' चटथावल ग्राम ' में पहुँचे, तो वहाँ एक बाग में ठहर गये , जिसमें देवी का मन्दिर था । स्नान और नित्य - नियमादि कर रसोई बनाने की तैयारी करने लगे । उसी समय किसी ने आकर देवी को बकरे की बलि चढाई । यह देख उन्हें ग्लानि हई । उन्होंने सोचा कि यहाँ भोजन छोड पानी भी पीने का धर्म नहीं है । इसलिये उन्होंने रसोई नहीं बनाई । भूखे रह गये । उस समय उनके देह से ऐसा तेज निकला, जिसे देवी सहन न कर सकी । वह नया रूप धारण कर सन्तों के पास गयी । उनसे रसोई बनाने का आग्रह किया । सन्तों ने रसोई न बनाने का कारण बताया । तब वह बोली- " जिसके कारण आपको इतनी ग्लानि हुई है और आपने रसोई न बनाने का निश्चय किया है , वह देवी मैं ही हूँ । अब आप मुझ पर कृपा कीजिये । मुझे अपना शिष्य बना लीजिये , जिससे फिर कभी यहाँ बलि चढ़ने का प्रश्न ही न रहे और आप रसोई बनाकर भगवान का प्रसाद ग्रहण कीजिये । "
श्रीहरिव्यासदेवजी ने प्रसन्न हो देवी को दीक्षा दी । दीक्षा लेकर वह नगर की तरफ दौड़ी । उस गाँव के मुखिया की खाट उलट दी और या उसकी छाती पर चढ़कर बोली - " मैं श्रीहरिव्यासदेव की शिष्या बन गयी हूँ । तुम लोगों को भी उनका शिष्य बनना पड़ेगा । यदि न बनोगे तो तुम सबको मार डालूँगी । "
देवी का आदेश पाकर उस गाँव के सब लोगों ने श्रीहरिव्यासजी से दीक्षा ले ली । उनके पाप - ताप सब दूर हो गये । नया शरीर धारण कर भजन करते हए वे संसार - सागर से पार हो गये ।