(राग विहाग)
पोढ़े हरि राधिका के संग। [1]
रंग महल में ललित तिबारी परदा परै सुरंग।। [2]
झल मलात पावक अंगीठी रत्न जटित वहोत रंग। [3]
कुम्भनदास प्रभु गोवर्धन धर मोहत कोटि अनंग।। [4]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (302)
श्री कृष्ण श्री राधा के संग रंग महल में विराज रहे हैं। [1]
रंग महल में तीन द्वार हैं जिसमें रंगीन परदे लगे हुए हैं। [2]
कई रंगों के अनमोल रत्नों से जटित एक अंगीठी से झिलमिल झिलमिल रौशनी प्रकट हो रही है। [3]
श्री कुंभनदासजी कहते हैं "मेरे प्रभु गिरधारी ने अनंत कोटि कामदेवों की शोभा को भी हेय कर दिया है"। [4]
पोढ़े हरि राधिका के संग। [1]
रंग महल में ललित तिबारी परदा परै सुरंग।। [2]
झल मलात पावक अंगीठी रत्न जटित वहोत रंग। [3]
कुम्भनदास प्रभु गोवर्धन धर मोहत कोटि अनंग।। [4]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (302)
श्री कृष्ण श्री राधा के संग रंग महल में विराज रहे हैं। [1]
रंग महल में तीन द्वार हैं जिसमें रंगीन परदे लगे हुए हैं। [2]
कई रंगों के अनमोल रत्नों से जटित एक अंगीठी से झिलमिल झिलमिल रौशनी प्रकट हो रही है। [3]
श्री कुंभनदासजी कहते हैं "मेरे प्रभु गिरधारी ने अनंत कोटि कामदेवों की शोभा को भी हेय कर दिया है"। [4]

