दरसन दीजै नैंक दया कर - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (137)

दरसन दीजै नैंक दया कर - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (137)

दरसन दीजै नैंक दया कर। [1]
हास-चाँदनी हँसि छिटकावौ, मेटहु हिय कौ तिमिर कृपाकर॥ [2]
भव कौ ताप मिटाइय प्यारी, चितवहु नयन कोर करुणाकर। [3]
'भोरी' दृग रस विकल चकोरी, अलबेली मुख विमल सुधाकर॥ [4]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (137)

हे प्यारी जू! आप थोड़ी सी दया करते हुए, मुझे अपने दर्शन देने की कृपा करें। [1]
जब आप कृपा करके अपनी मन्द-मधुर मुस्कान के साथ मुझे अपने दर्शन देंगी, तब आपकी हास्य रूपी चाँदनी मेरे हृदय के समस्त अन्धकार को दूर कर देगी। [2]
जब आप अपने करुणा से भरे हुए नेत्रों से मेरे ऊपर अपनी दृष्टि डालोगी, तब मेरे भव के समस्त प्रकार के तापों का विनाश हो जायगा। [3]
श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि हे अलबेली! मेरे नेत्र रूपी चकोर आपके निर्मल मुख रूपी चन्द्रमा के अमृतमय रूप-रस का पान करने के लिये अत्यन्त विह्वल हो रहे हैं। [4]