दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (18)

दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (18)

दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी, वेणुध्वनिं क्व च निशम्य च विह्वलाङ्गी।
सा श्यामसुन्दरगुणैरनुगीयमानैः प्रीता परिष्वजतु मां वृषभानुपुत्री॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (18)

जो अपने प्रियतम श्रीलालजी को देखते ही चम्पकलता के समान अङ्ग-अङ्ग से चमत्कृत हो उठती हैं, और कभी मन्द-मन्द वेणु-ध्वनि को सुनकर जिनके समस्त अङ्ग विह्वल हो उठते हैं। अहो ! वे श्रीवृषभानु नन्दिनी मेरे द्वारा गाये हुए अपने प्रियतम श्यामसुन्दर के गुणों को श्रवण कर क्या कभी मुझे प्रीतिपूर्वक आलिङ्गन करेंगी ?