(दोहा)
स्याम बतायौ नैंन में, रही समुझि सुकुँवारि।
चरन लग्यौ जब कह्यौ तब, हरषी लाल निहारि॥
(पद) [राग सोरठा - एकताल]
राधे नन्द नन्दन सौं नेह। [1]
लखि रह्यौ श्याम नैंनन में तेरे, कहा करिहै दुरि गेह ।। [2]
कुँवरी कुँवर तौ चरण लागि रहे निरखि रूप सुख देह। [3]
जावक अंकित लखि जै श्री भट्ट भई कुँवरि हरि प्रेह ।। [4]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (30)
(दोहा)
श्रीश्यामसुन्दर ने नेत्रों के संकेतों में अपनी विनती मानिनी श्रीराधा के समक्ष रखी, श्रीराधा ने उस विनती को नेत्रों में ही स्वीकार किया। परंतु जब श्रीकृष्ण ने विनम्रतापूर्वक अपने मस्तक को श्रीराधा के चरण-कमलों में रखकर मनुहार किया, तब श्रीराधा अपने मान को त्यागकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हो उठीं।
(पद)
श्री राधा का नन्द नन्दन से अत्यंत स्नेह है। [1]
सखियाँ कह रही है कि - राधे, प्रियतम श्री श्याम-सुन्दर से तू रूठ तो रही है पर तेरा यह नन्दनन्दन से स्नेह छुपा हुआ नहीं रह रहा है, देख तेरे नैनों में श्याम-सुन्दर का स्वरूप दिख रहा है। फिर यह दूरी बढ़ा कर क्या करेंगे? [2]
वृषभानु कुंवरी, नन्द कुँवर तेरी मनुहार में लगें है [आपके चरणों से लगे हैं], नेक इनका रूप निहार कर परस्पर एक दूसरे को सुखी करों। [3]
श्री भट्ट देवाचार्य जी कहते हैं कि श्री राधा ने जब श्याम सुन्दर की ओर दृष्टि डाली तो इन श्याम सुन्दर के सुभग सिर पर अपना महावर देखकर कुँवरी हरि प्रेम के अधीन हो गई । [4]
स्याम बतायौ नैंन में, रही समुझि सुकुँवारि।
चरन लग्यौ जब कह्यौ तब, हरषी लाल निहारि॥
(पद) [राग सोरठा - एकताल]
राधे नन्द नन्दन सौं नेह। [1]
लखि रह्यौ श्याम नैंनन में तेरे, कहा करिहै दुरि गेह ।। [2]
कुँवरी कुँवर तौ चरण लागि रहे निरखि रूप सुख देह। [3]
जावक अंकित लखि जै श्री भट्ट भई कुँवरि हरि प्रेह ।। [4]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (30)
(दोहा)
श्रीश्यामसुन्दर ने नेत्रों के संकेतों में अपनी विनती मानिनी श्रीराधा के समक्ष रखी, श्रीराधा ने उस विनती को नेत्रों में ही स्वीकार किया। परंतु जब श्रीकृष्ण ने विनम्रतापूर्वक अपने मस्तक को श्रीराधा के चरण-कमलों में रखकर मनुहार किया, तब श्रीराधा अपने मान को त्यागकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हो उठीं।
(पद)
श्री राधा का नन्द नन्दन से अत्यंत स्नेह है। [1]
सखियाँ कह रही है कि - राधे, प्रियतम श्री श्याम-सुन्दर से तू रूठ तो रही है पर तेरा यह नन्दनन्दन से स्नेह छुपा हुआ नहीं रह रहा है, देख तेरे नैनों में श्याम-सुन्दर का स्वरूप दिख रहा है। फिर यह दूरी बढ़ा कर क्या करेंगे? [2]
वृषभानु कुंवरी, नन्द कुँवर तेरी मनुहार में लगें है [आपके चरणों से लगे हैं], नेक इनका रूप निहार कर परस्पर एक दूसरे को सुखी करों। [3]
श्री भट्ट देवाचार्य जी कहते हैं कि श्री राधा ने जब श्याम सुन्दर की ओर दृष्टि डाली तो इन श्याम सुन्दर के सुभग सिर पर अपना महावर देखकर कुँवरी हरि प्रेम के अधीन हो गई । [4]

